चायना से आने वाले सामान ने प्रजपतों से भी छीना काम, चायना लड़ी ने मिट्टी के दीपक बुझाए।

भदौड़ – (विजय जिंदल) दिन व दिन हाईटेक होते जा रहे युग में चायना से आने वाला सस्ता सामान पूरे विश्व पर भारी पड़ता जा रहा है। इसी के चलते दीवाली पर्व पर देश को रौशन करने वाले मिट्टी के दीप पर भी गत कई वर्षों से चायना से आ रही घटीय लड़ी की मार पड रही है।
भले ही भारत के प्रधानमंत्री नरिंद्र मोदी त्योहारों आदि पर स्वदेशी साजो सामान की खरीददारी पर जोर दे रहे हैं परंतु चायना से आने वाले कचरा सामान की मार के तले भारत से छोटे से बड़े सभी उद्योग आ चुके हैं। दीवाली पर हाथ से बने मिट्टी के दीप जलाना हजारों वर्ष पुरानी परंमपरा रही है लेकिन चायना से आने वाली सस्ती लड़ीयों नें अब मिट्टी के दीप लगभग बुझा ही दिए हैं। कई-कई महीने पहले जुट जाते थे काम में-
मालूम हो कि खासकर दीवाली के त्योहार के लिए हाथ से बर्तन तैयार करने वाले प्रजापत्त घुम्मार (बिरादरी) के लोग लगभग दो महीने पहले से ही मिट्टी के दीपक बनाने में जुट जाते थे और कई-कई दिन पहले तक विभिंन्र गांवों में भी मिट्टी के दीपक, मशाल, घरूड़ी आदि बेचने में वयस्थ हो जाते थे। ये लोग मेहनत सदका अपनी कलाकारी के साथ ही अपना जीवन व्यतीत करते चले आ रहे हैं। -क्या कहते हैं प्रजापत मिट्टी के दीप पर चायना लड़ी के भारी पडऩे के सबंधी नानकसर रोड़ भदौड़ निवासी प्रजापत गोधा सिंह पुत्र बारा सिंह व प्रजापत बिरादरी संगठन के अध्यक्ष तरसेम सिंह ने बताया कि ने बताया कि हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाना हमारा पुशतैनी पेशा रहा है हमारे साथ-साथ भदौड़ में ही दस से ज्यादा परिवार खासकर दीवाली के दिनों में मिट्टी के दीए (दीपक) मशालें, पूजा के लिए सुंदर घरूंडी आदि बनाकर उसपर हाथ से ही कलाकारी कर रंग भरने के बाद आस-पास के नौं दस गावों में बेचने जाते थे और इससे हुए मुनाफे से ही साल भर काम चलाते थे परंतु चायना से आने वाली सस्ति बिजलई लड़ीयों के कारन अब हाथ से बने मिट्टी के दीए (दीपकों) से लोगों का मोह भंग हो गया है बस मजबूरी बस अपना खानदानी काम छोड़ नहीं सकते। क्योंकि आज के समय में इस धंधे के साथ पेट भरना बहुत मुश्किल हो गया है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से भी हमारे धंधे को कोई सब्सिडी या सहायता न देकर हमारे साथ धक्का किया जा रहा है।
-दीवाली के दिनों में इक्ठा हो जाती थी गेहूं-
इसके अलावा उन्होंने बताया कि दीपावलि के दिनों में हम लोग विभिंन्र गावों में जाकर दीए आदि बेच कर गेहूँ व रुपए इक्ठे हो जते थे सबंधित बिरादरी की एक बर्जुग औरत भगवंत कौर कहा कि सरकार की ओर से चक्क पर लोन देना बंद दिया गया है। नौजवाल पीड़ी भी अपने पिता पुरखी धंदों से मुँह मोड़ रही है, इन मिट्टी के दियों की जगह अब चायनज़ लायटें और लड़ीयों ने ले ली है। हमने देखा कि इन मिहनत कश कलाकारों के पास बड़ी मात्रा में घरुंडियां, झकरीआंा, दीये और मशालें पड़ीं संकेत दे रही हैं कि इन मेहनती कारीगरों की मीनाकशी अब लोगों के आर्कशन पर नहीं रही।