दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा शिअद की मान्यता रद्द करने की याचिका पर नोटिस जारी

शिरोमणि अकाली दल (ब) की रजिस्ट्रेशन रद्द करने बारे एक ताजा याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने गत दिवस चुनाव आयोग, अकाली दल, एस.जी.पी.सी., डी.एस.जी.पी.सी. सहित 5 अन्य उत्तरदाताओं को नोटिस जारी किए हैं। माल्टा बोट त्रासदी जांच मिशन के चेयरमैन व सामाजिक कार्यकत्र्ता बलवंत सिंह खेड़ा व एक अन्य कार्यकर्ता ओम सिंह सतियाना ने अपने वकीलों प्रशांत भूषण, इंदिरा उन्नीनायर, नारायण कृष्ण व बिबिन कुरियन के माध्यम से यह याचिका अदालत में दायर की थी।

उक्त याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूॢत सी. हरि शंकर की पीठ ने सुनवाई की। इस केस में पंजाब राज्य चुनाव आयोग, गुरुद्वारा चुनाव आयोग व गुरुद्वारा चुनाव निदेशालय भी उत्तरदाताओं में शामिल है। वयोवृद्ध खेड़ा 2004 से इस मुद्दे के पीछे लगे हुए हैं। उन्होंने पहले भी इस मामले में चुनाव आयोग से शिअद (ब) की मान्यता रद्द करने की मांग की थी। उन्होंने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि अकाली दल (ब) देश के सैकुलर ताने-बाने का उल्लंघन कर रहा है।

उन्होंने 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिस पर सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी है। उन्नीनायर ने बताया कि इससे पहले हाईकोर्ट ने उन्हें याचिका वापस लेने और नई समेकित याचिका दायर करने को कहा था। याचिका में दलील दी गई थी कि शिअद ने छल भरे ढंग से 1989 में दावा किया था कि वह सैकुलर पार्टी है और इस तरह धोखाधड़ी के आधार पर पंजीकरण करवाना चाहा था। इसने अपना संविधान पूरी तरह झूठ की बुनियाद पर तैयार किया था और इसमें 1974 के पार्टी संविधान से संबंधित जानकारी छिपाई गई थी। खेड़ा ने शिअद के विरुद्ध इस याचिका में कहा है कि यह पार्टी न केवल एस.जी.पी.सी. और डी.एस.जी.पी.सी. के चुनावों में हिस्सा लेती है बल्कि केवल वयस्क सिख पुरुषों और महिलाओं को ही अपनी सदस्यता प्रदान करती है इसलिए यह पार्टी पंजीकरण हासिल करने के लिए पर्याप्त शर्तें पूरी नहीं करती।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि शिअद ने अनेक प्रकार की धोखाधडिय़ां की हैं और वैध राजनीतिक पार्टी के तौर पर पात्रता सिद्ध करने के लिए अनेक जालसाजियां कर चुकी है। याचिका के अनुसार भारतीय संविधान व जनप्रतिनिधि अधिनियम व सुप्रीम कोर्ट किसी भी राजनीतिक दल को किसी विशेष धर्म के साथ कतारबद्ध होने की मनाही करते हैं यानी की राजनीतिक दलों को मजहब के मामले में निष्पक्ष होना चाहिए फिर भी अकाली दल ने सब कुछ जानते हुए धोखा किया और अभी भी यह सिलसिला जारी है। मामले बारे शिअद के एक सी. नेता का कहना है कि पार्टी को बदनाम करने की साजिशें की जाती रही हैं पर अकाली दल दिन-ब-दिन मजबूत हुआ है। उनका कहना है कि इस केस का भी पार्टी मजबूती से जवाब देगी।